उज्जैन की पवित्र नगरी में वैदिक विधि-विधान एवं शास्त्रोंक्त संकल्प के साथ कुंभ विवाह एवं अर्क विवाह पूजा संपन्न कराई जाती है। कुंडली में उपस्थित मांगलिक दोष, वैधव्य योग या विवाह में आ रही अनावश्यक बाधाओं को दूर करने के लिए यह एक प्रामाणिक एवं फलदायी वैदिक उपाय है।
ज्योतिषाचार्य पंडित हरिओम शर्मा जी द्वारा शास्त्रोक्त मंत्रोच्चार, संकल्प, होम-हवन एवं पारंपरिक पूजा अनुष्ठान संपन्न कराया जाता है, जिससे जातक के दांपत्य जीवन में सुख, शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
जिस किसी पुरुष के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो या अन्य किसी दोष को दूर करने के लिए उस पुरुष के विवाह के पूर्व सूर्य पुत्री जिन्हे अर्क वृक्ष के रूप मे पूजा जाता है के साथ विवाह किया जाता है, जिससे उस पुरुष के विवाह मे आ रहे समस्त प्रकार के दोषो से मुक्ति मिल जाती है। पुरुष का विवाह से पूर्व किए गए इस प्रकार के विवाह को अर्क विवाह पूजा के नाम से जाना जाता है।
किसी कन्या के विवाह मे आ रही समस्याओ या किसी दोष को दूर करने के लिए उस कन्या के विवाह से पूर्व घट (कुम्भ) जिसमे भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित की जाती है के साथ विवाह किया जाता है, जिससे कन्या के विवाह मे आ रही सभी बधाओ और दोषो से मुक्ति मिल जाती है। कुम्भ विवाह होने के पश्चात भगवान विष्णु की मूर्ति को जलाशय मे विसर्चित कर कन्या का विवाह इच्छुक वर के साथ कर दिया जाता है। कन्या के विवाह से पूर्व किए गए विवाह को घट विवाह या कुम्भ विवाह पूजा के नाम से जाना जाता है।
इस प्रक्रिया में कन्या और मिट्टी से बने हुए घट के बीच प्रतीकात्मक विवाह का आयोजन किया जाता है। कुम्भ विवाह ,एक सामान्य विवाह की तरह ही होता है जिसमें कन्या के माता पिता द्वारा कन्या दान किया जाता है, फेरों की रस्म भी निभाई जाती है। पंडित के द्वारा विवाह के मंत्रो का भी उच्चारण किया जाता है।जब सम्पूर्ण प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो घट को तालाब या नदी के बहते पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है।घट विवाह के बाद कन्या का विवाह वास्तविक वर के साथ किया जाता है।
कुम्भ विवाह, कन्या का प्रथम विवाह माना जाता है और घट (कुम्भ ) कन्या के प्रथम पति का प्रतीक होता है। इस कुम्भ विवाह से कन्या की कुंडली में मंगल दोष, मंगल की खराब स्थिति या वैधव्य योग का दोष समाप्त हो जाता है।
किसी भी जातक (वर) की कुंडली में इस तरह के दोष हों, तो सूर्य कन्या अर्क वृक्ष से व्याह करना, अर्क विवाह कहलाता है। इस प्रक्रिया से दाम्पत्य सुखों में वृद्धि होती है और वैवाहिक विलंब दूर होता है।
उज्जैन में संपन्न होने वाली कुंभ एवं अर्क विवाह पूजा पूर्णतः शास्त्रोंक्त विधि-विधान, शुद्ध मंत्रोच्चार एवं संकल्पबद्ध प्रक्रिया के अंतर्गत संपन्न होती है:
अर्क विवाह पुरुषों (वर) के लिए सूर्य पुत्री अर्क वृक्ष के साथ किया जाता है, जबकि कुंभ (घट) विवाह कन्याओं (वधु) के लिए भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित मिट्टी के कलश (घट) के साथ संपन्न कराया जाता है।
हाँ, शास्त्रोंक्त मान्यता के अनुसार घट विवाह को प्रथम विवाह माना जाता है जिससे कुंडली का मंगल दोष अथवा वैधव्य योग घट पर अंतरित हो जाता है और वास्तविक विवाह में कोई दोष नहीं रहता।
यह संपूर्ण वैदिक अनुष्ठान लगभग 2 से 3 घंटे का होता है, जिसमें संकल्प, गौरी-गणेश पूजन, प्रतिष्ठा, फेरे, हवन और विसर्जन की संपूर्ण विधि शामिल होती है।
उज्जैन बाबा महाकाल की मोक्षदायिनी पावन नगरी तथा मंगल देव की उत्पत्ति भूमि (मंगलनाथ तीर्थ) है। यहाँ शास्त्र सम्मत विधि से किया गया दोष निवारण अत्यंत फलदायी और शीघ्र प्रभावी माना जाता है।
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